इलाहाबाद हाईकोर्ट  – एक महत्वपूर्ण निर्णय, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बुधवार को मदरस सहित सभी शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगान गाना अनिवार्य किया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मदरसों को राष्‍ट्रगान गाने से छूट मांगी गई थी। कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्‍पष्‍ट कहा कि राष्‍ट्रगान और राष्‍ट्रध्‍वज का सम्‍मान करना हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्‍य है। ऐसे में जाति, धर्म और भाषा के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

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आखिर क्‍या कहा इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ?

इलाहाबाद हाईकोर्ट का कहना है कि  राष्ट्रगान और तिरंगे का सम्मान करना भारत के सभी लोगो का संवैधानिक कर्तव्य है। उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रगान को जाति, धर्म और भाषा भेद से परे बताते हुए मदरसों की आपत्तियों को दरकिनार कर दिया। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब मदरसों में राष्ट्रगान अनिवार्य रूप से गाना ही पड़ेगा। चीफ जस्टिस डीबी भोसले और जस्टिस यशवंत वर्मा की खंड पीठ ने ये आदेश दिया है।

किसने दायर की थी याचिका?

इलाहाबाद हाईकोर्ट में अलाउल मुस्तफा ने याचिका दाखिल की थी। याचिका में उन्‍होंने मांग की थी कि मदरसों को राष्‍ट्रगान गाने में छूट मिलनी चाहिए।

आखिर क्‍यों किया जा रहा राष्‍ट्रगान गाने का विरोध, जानिए वजह

पिछले स्‍वतंत्रता दिवस पर मदरसों में राष्‍ट्रगान गाने को लेकर बरेली की दरगाह आला हजरत ने ऐतराज जताया था। हालांकि देवबंदियों का नजरिया बिल्‍कुल अलग है। आला हजरत ने राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ और राष्ट्रगीत वंदे मातरम गाने से साफ इनकार कर दिया था। आला हजरत दरगाह में राष्ट्रगान की जगह सारे जहां से ‘अच्छा हिन्‍दोस्‍तां हमारा‘ गाने की बात कही गई थी।

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दूसरी तरफ देवबंद के दारुल उलूम समेत अन्य उलेमा ए कराम ने आला हजरत के बयान को नकार दिया था। उलेमा ने कहा था कि पहले राष्ट्रगान को समझें और फिर बयानबाजी करें।

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